टार्गेटेड थेरेपी क्या है और यह कीमो से कैसे अलग है

oncare team
Updated on Sep 17, 2026 15:37 IST

By Dr. Gajendra Kumar Himanshu

टार्गेटेड थेरेपी क्या है

टार्गेटेड थेरेपी कैंसर के इलाज की एक ऐसी पद्धति है जिसमें दवा कैंसर कोशिकाओं में मौजूद किसी खास प्रोटीन, जीन या molecular change को निशाना बनाने की कोशिश करती है। इसके लिए पहले यह पता करना जरूरी हो सकता है कि मरीज के कैंसर में वह target मौजूद है या नहीं। वहीं, कीमोथेरेपी तेजी से बढ़ने और विभाजित होने वाली कोशिकाओं पर व्यापक असर डालती है। इसलिए दोनों treatments का काम करने का तरीका अलग है, हालांकि कुछ मरीजों में इन्हें एक साथ भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

आज के ब्लॉग में हम आपको बताएंगे कि टार्गेटेड थेरेपी क्या होती है, यह कैंसर की कोशिकाओं पर कैसे काम करती है, कीमोथेरेपी से इसका क्या अंतर है, biomarker testing की जरूरत क्यों पड़ सकती है और किन स्थितियों में डॉक्टर targeted therapy को treatment plan में शामिल करते हैं।

टार्गेटेड थेरेपी को आसान भाषा में समझें

कैंसर की कोशिकाएं सामान्य कोशिकाओं से अलग होती हैं। उनमें कुछ ऐसे बदलाव हो सकते हैं जो उन्हें लगातार बढ़ने और शरीर में फैलने में मदद करते हैं। कुछ कैंसर कोशिकाएं खास proteins या molecular signals पर निर्भर रहती हैं।

टार्गेटेड थेरेपी की दवाएं इन्हीं खास targets पर काम करने के लिए बनाई जाती हैं। कुछ दवाएं उस signal को रोकती हैं जो cancer cells को बढ़ने का संदेश देता है। कुछ दवाएं cancer cells को immune system के लिए पहचानने में मदद कर सकती हैं। कुछ targeted medicines cancer cells तक दवा पहुंचाने के लिए antibody का इस्तेमाल भी करती हैं।

इसका मतलब यह नहीं है कि targeted therapy केवल कैंसर कोशिकाओं पर ही असर करेगी या इसके side effects नहीं होंगे। दवा का असर उसके target और शरीर पर निर्भर करता है।

टार्गेटेड थेरेपी देने से पहले क्या जांच होती है?

यह treatment शुरू करने से पहले डॉक्टर कई बार biomarker testing की सलाह देते हैं। इस जांच में cancer cells के genes, proteins या दूसरे molecular changes को देखा जाता है।

अगर रिपोर्ट में ऐसा biomarker मिलता है जिसके लिए कोई उपयुक्त targeted medicine उपलब्ध है, तो डॉक्टर उसे treatment का विकल्प मान सकते हैं। यह testing tumor tissue, biopsy या कुछ परिस्थितियों में blood sample से भी की जा सकती है।

Biomarker testing क्यों जरूरी है?

हर मरीज के कैंसर में एक जैसे molecular changes नहीं होते। यहां तक कि एक ही प्रकार के कैंसर वाले दो लोगों में भी अलग-अलग biomarkers हो सकते हैं। इसलिए डॉक्टर केवल कैंसर के अंग का नाम देखकर targeted therapy तय नहीं करते। वे यह भी देखते हैं कि कैंसर की कोशिकाओं में कौन सा target मौजूद है और उस target के लिए कौन सा treatment उपलब्ध है।

कीमोथेरेपी कैसे काम करती है?

कीमोथेरेपी ऐसी दवाओं का इस्तेमाल करती है जो कैंसर और दूसरी तेजी से बढ़ने वाली कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती हैं। कैंसर कोशिकाएं अक्सर तेजी से बढ़ती और विभाजित होती हैं, इसलिए chemotherapy उन पर असर डाल सकती है।

लेकिन शरीर की कुछ सामान्य कोशिकाएं भी तेजी से बढ़ती हैं। उदाहरण के लिए, बालों की जड़ों और digestive system की lining में मौजूद cells। Chemotherapy इन cells को भी प्रभावित कर सकती है। इसी वजह से कुछ मरीजों को बाल झड़ना, मतली, मुंह में छाले या blood counts कम होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

हर chemotherapy drug में side effects अलग हो सकते हैं और हर मरीज को सभी side effects हों, यह जरूरी नहीं है।

Targeted therapy और chemotherapy में क्या अंतर है?

दोनों का इस्तेमाल कैंसर के इलाज में किया जाता है, लेकिन इनके काम करने का तरीका अलग है।

तुलना

टारगेटेड थेरेपी

कीमोथेरपी

मुख्य निशाना

खास protein, gene या molecular target

तेजी से बढ़ने वाली कोशिकाएं

बायोमार्कर टेस्टिंग

कई treatments में जरूरी हो सकती है

आमतौर पर specific target की जरूरत नहीं

काम करने का तरीका

खास cancer pathway या target को रोकना

तेजी से बढ़ने वाली cells को नुकसान पहुंचाना

असर

खास molecular feature वाले cancer पर केंद्रित

ज्यादा व्यापक हो सकता है

दुष्प्रभाव

दवा और target के अनुसार

दवा और regimen के अनुसार

उपयोग

केवल कुछ cancers और specific targets में

कई प्रकार के cancers में

संयोजन

दूसरी therapies के साथ दी जा सकती है

दूसरी therapies के साथ दी जा सकती है

यह सामान्य तुलना है। किसी मरीज के लिए कौन सा treatment सही है, यह उसकी cancer report, stage, biomarkers और overall health पर निर्भर करता है।

क्या Targeted Therapy, Chemotherapy से बेहतर है?

इसका कोई सीधा जवाब नहीं है। अगर किसी मरीज के कैंसर में ऐसा target मौजूद है जिसे कोई प्रभावी targeted drug निशाना बना सकती है, तो यह treatment बहुत उपयोगी हो सकता है। लेकिन हर cancer में target नहीं मिलता और target मिलने के बाद भी medicine हर व्यक्ति में समान असर करे, यह जरूरी नहीं है।

कई बार chemotherapy की जरूरत होती है। कुछ मामलों में targeted therapy और chemotherapy दोनों treatment plan के हिस्से बन सकते हैं। Cancer treatment में surgery, radiation, chemotherapy, targeted therapy और immunotherapy में से एक या कई तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसलिए किसी दूसरे मरीज का treatment देखकर अपनी therapy चुनना सही नहीं है।

Targeted Therapy के क्या side effects हो सकते हैं?

Targeted therapy को ज्यादा specific माना जाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इससे side effects नहीं होते। दवा के अनुसार कुछ मरीजों में ऐसी समस्याएं हो सकती हैं:

  • थकान
  • त्वचा पर rash
  • दस्त
  • भूख में बदलाव
  • blood pressure में बदलाव
  • liver function में बदलाव
  • हाथ-पैर से जुड़ी परेशानी

हर targeted medicine का असर अलग होता है। इसलिए treatment शुरू करने से पहले डॉक्टर से यह समझना जरूरी है कि दी जाने वाली दवा से कौन से side effects हो सकते हैं और उन्हें कैसे manage किया जाएगा।

क्या हर कैंसर मरीज को Targeted Therapy दी जा सकती है?

नहीं। Targeted therapy तभी treatment option बन सकती है जब कैंसर में ऐसा target मौजूद हो जिसे उपलब्ध दवा निशाना बना सके और मरीज की स्थिति में उसका इस्तेमाल उचित हो।

Biomarker test में target नहीं मिलने पर targeted therapy का लाभ नहीं मिल सकता। कभी-कभी target मिलने के बावजूद दवा काम नहीं करती, क्योंकि कैंसर की सभी कोशिकाओं में एक जैसे biomarkers नहीं होते या समय के साथ cancer में बदलाव आ सकते हैं।

इसीलिए treatment का फैसला केवल एक test report के आधार पर नहीं किया जाता। Oncologist पूरी clinical picture को देखते हैं।

अगर आप Targeted therapy के बारे में और जानकारी पढ़ना चाहते हैं, तो National Cancer Institute की आधिकारिक वेबसाइट पर विश्वसनीय जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

आज ही परामर्श लें

Targeted therapy और chemotherapy दोनों कैंसर के महत्वपूर्ण उपचार हैं, लेकिन दोनों एक तरह से काम नहीं करते। Chemotherapy तेजी से बढ़ने वाली कोशिकाओं को व्यापक रूप से प्रभावित करती है, जबकि targeted therapy कैंसर की कोशिकाओं में मौजूद किसी खास molecular target को निशाना बनाने की कोशिश करती है। Targeted therapy का विकल्प तभी सामने आता है जब कैंसर में ऐसा target मौजूद हो और उसके लिए उपयुक्त treatment उपलब्ध हो।

अगर आपकी cancer report में biomarker, gene mutation, protein expression या targeted therapy का जिक्र है, तो Oncare Cancer Hospital में oncology specialist से सलाह लेकर अपनी report का सही मतलब समझना बेहतर है। बिना medical evaluation के खुद से कोई targeted medicine या chemotherapy शुरू नहीं करनी चाहिए।

डिस्क्लेमर

यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। Targeted therapy और chemotherapy का चुनाव कैंसर के प्रकार, stage, biomarkers, पहले दिए गए उपचार और मरीज की overall health के आधार पर किया जाता है। किसी भी दवा को शुरू या बंद करने का फैसला केवल treating oncologist की सलाह से करें।

Frequently Asked Questions

Written and Verified by:

Dr. Gajendra Kumar Himanshu

Dr. Gajendra Kumar Himanshu Exp: 10 Yr

Medical Officer

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