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एलएफटी और केएफटी टेस्ट: कीमो से पहले लिवर-किडनी की जांच क्यों जरूरी है
कीमोथेरेपी शुरू करने से पहले एलएफटी (Liver Function Test) और केएफटी (Kidney Function Test) कराना बहुत जरूरी होता है। ये दोनों जांच यह पता लगाती हैं कि मरीज का लिवर और किडनी दवाओं को सुरक्षित तरीके से संभाल पाएंगे या नहीं। अगर इन अंगों की कार्यक्षमता कम हो, तो डॉक्टर दवा की मात्रा बदल सकते हैं या उपचार की योजना को सुरक्षित बना सकते हैं।
आज के इस ब्लॉग में हम आपको बताएंगे कि एलएफटी और केएफटी टेस्ट क्या होते हैं, कीमो से पहले इनकी जरूरत क्यों पड़ती है, रिपोर्ट में क्या देखा जाता है, सामान्य वैल्यू क्या होती है और किन लोगों को इन जांचों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
एलएफटी और केएफटी टेस्ट क्या होते हैं?
जब किसी मरीज को कैंसर का इलाज शुरू करना होता है, तब डॉक्टर केवल बीमारी नहीं देखते बल्कि शरीर की पूरी स्थिति का भी आकलन करते हैं। कीमो की कई दवाएं लिवर में टूटती हैं और किडनी के जरिए शरीर से बाहर निकलती हैं। इसलिए इन दोनों अंगों का स्वस्थ होना बहुत जरूरी है।
एलएफटी से लिवर की कार्यक्षमता जांची जाती है, जबकि केएफटी से किडनी कितनी अच्छी तरह खून को साफ कर रही है, इसका पता चलता है।
इन दोनों टेस्ट के आधार पर डॉक्टर यह तय करते हैं कि मरीज को कौन सी दवा, कितनी मात्रा में और कितने अंतराल पर दी जाए।
कीमोथेरेपी से पहले ये जांच क्यों जरूरी होती है?
हर मरीज की शारीरिक क्षमता अलग होती है। एक ही दवा दो अलग मरीजों पर अलग असर डाल सकती है। यदि लिवर या किडनी कमजोर हों, तो दवा शरीर में जमा हो सकती है और गंभीर दुष्प्रभाव बढ़ सकते हैं।
कीमो से पहले जांच कराने के मुख्य कारण:
- लिवर और किडनी की वास्तविक स्थिति जानना
- दवा की सही डोज तय करना
- इलाज के दौरान होने वाले जोखिम को कम करना
- पहले से मौजूद बीमारी का पता लगाना
- उपचार को सुरक्षित और प्रभावी बनाना
यही वजह है कि लगभग हर कीमो साइकिल से पहले डॉक्टर ब्लड टेस्ट दोबारा भी करवाते हैं।
एलएफटी टेस्ट में क्या-क्या जांचा जाता है?
एलएफटी कई अलग-अलग मापदंडों का समूह है। इससे केवल एक संख्या नहीं बल्कि लिवर की पूरी कार्यक्षमता का अंदाजा मिलता है। इसके मुख्य पैरामीटर इस प्रकार हैं:
पैरामीटर | क्या बताता है? |
|---|---|
Bilirubin | पीलिया या लिवर की सफाई क्षमता |
SGOT (AST) | लिवर कोशिकाओं की स्थिति |
SGPT (ALT) | लिवर में सूजन या क्षति |
Alkaline Phosphatase | पित्त नली और लिवर संबंधी समस्या |
Albumin | लिवर द्वारा बनने वाला महत्वपूर्ण प्रोटीन |
अगर इनमें किसी भी पैरामीटर की वैल्यू सामान्य से काफी अलग आती है, तो डॉक्टर पहले उसका कारण समझते हैं और फिर कीमो की योजना बनाते हैं।
केएफटी टेस्ट में क्या देखा जाता है?
किडनी शरीर से अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकालने का काम करती है। कीमो की कई दवाएं इसी रास्ते से निकलती हैं। इसलिए किडनी सही तरह काम कर रही है या नहीं, यह जानना जरूरी होता है।
केएफटी के प्रमुख पैरामीटर
- Creatinine: किडनी की कार्यक्षमता का सबसे महत्वपूर्ण संकेत
- Blood Urea: शरीर में अपशिष्ट पदार्थ की मात्रा
- eGFR: किडनी कितनी तेजी से खून को फिल्टर कर रही है
- Uric Acid: कुछ मरीजों में अतिरिक्त जांच के रूप में देखा जाता है
इन रिपोर्टों को देखकर डॉक्टर तय करते हैं कि दवा की मात्रा कम करनी है या सामान्य रखनी है।
एलएफटी और केएफटी की सामान्य वैल्यू क्या होती है?
रिपोर्ट में लिखी वैल्यू लैब के अनुसार थोड़ी अलग हो सकती है। इसलिए हमेशा डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही रिपोर्ट समझनी चाहिए।
जांच | सामान्य सीमा (लगभग) |
|---|---|
Bilirubin | 0.3–1.2 mg/dL |
SGPT (ALT) | 7–56 U/L |
SGOT (AST) | 10–40 U/L |
Creatinine | 0.6–1.3 mg/dL |
Urea | 15–40 mg/dL |
eGFR | 90 या उससे अधिक (mL/min/1.73m²) |
ध्यान रखें कि केवल रिपोर्ट देखकर खुद कोई निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। मरीज की उम्र, वजन, बीमारी और दूसरी दवाएं भी निर्णय में महत्वपूर्ण होती हैं।
अगर रिपोर्ट सामान्य न हो तो क्या कीमो रुक जाती है?
बहुत से मरीज यह सोचकर घबरा जाते हैं कि खराब रिपोर्ट का मतलब इलाज बंद हो जाएगा। वास्तव में ऐसा हर बार नहीं होता।
डॉक्टर पहले यह देखते हैं कि बदलाव कितना गंभीर है। कई मामलों में दवा की डोज कम कर दी जाती है, कुछ दवाएं बदली जाती हैं या कुछ दिन बाद दोबारा टेस्ट कराया जाता है। यानी उद्देश्य इलाज रोकना नहीं बल्कि उसे सुरक्षित बनाना होता है।
इसलिए रिपोर्ट खराब आने पर बिना सलाह के घबराने की जरूरत नहीं है।
किन मरीजों को इन जांचों पर विशेष ध्यान देना चाहिए?
कुछ लोगों में लिवर और किडनी से जुड़ी समस्या पहले से मौजूद हो सकती है। ऐसे मरीजों की निगरानी अधिक सावधानी से की जाती है।
अधिक जोखिम वाले मरीज
- मधुमेह वाले मरीज
- हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोग
- पहले से किडनी रोग वाले मरीज
- फैटी लिवर या हेपेटाइटिस का इतिहास
- अधिक उम्र के मरीज
- लंबे समय से कई दवाएं लेने वाले लोग
इन मरीजों में डॉक्टर इलाज के दौरान बार-बार एलएफटी और केएफटी करवाने की सलाह दे सकते हैं।
कीमो के दौरान ये टेस्ट कितनी बार कराए जाते हैं?
यह पूरी तरह इलाज की योजना पर निर्भर करता है। कुछ मरीजों में हर कीमो साइकिल से पहले ब्लड टेस्ट होता है, जबकि कुछ में हर दो या तीन साइकिल के बाद विस्तृत जांच की जाती है।
आमतौर पर डॉक्टर इन स्थितियों में दोबारा टेस्ट लिख सकते हैं:
- नई कीमो दवा शुरू होने पर
- तेज कमजोरी या उल्टी होने पर
- पेशाब कम आने पर
- आंख या त्वचा पीली दिखाई देने पर
- रिपोर्ट में पहले से बदलाव मिलने पर
नियमित जांच से दुष्प्रभाव जल्दी पकड़ में आ जाते हैं और समय रहते इलाज में बदलाव किया जा सकता है।
रिपोर्ट अच्छी रखने के लिए मरीज क्या करें?
एलएफटी और केएफटी को बेहतर रखने का कोई जादुई तरीका नहीं है, लेकिन अच्छी जीवनशैली इलाज के दौरान शरीर को सहारा देती है।
रोजमर्रा की आसान सावधानियां
- पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं
- डॉक्टर की सलाह के बिना दवा या सप्लीमेंट न लें
- शराब और तंबाकू से पूरी तरह बचें
- संतुलित और हल्का भोजन करें
- समय पर सभी ब्लड टेस्ट कराएं
- किसी भी नए लक्षण की जानकारी तुरंत डॉक्टर को दें
याद रखें कि घरेलू नुस्खों से लिवर या किडनी ठीक करने की कोशिश करना नुकसानदायक हो सकता है, खासकर कीमो के दौरान।
अगर आप कैंसर ट्रीटमेंट के बारे में अधिक जानकारी पढ़ना चाहते हैं, तो National Cancer Institute की आधिकारिक वेबसाइट पर विश्वसनीय जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
आज ही परामर्श लें
यदि आपको या आपके किसी अपने को कीमोथेरेपी शुरू करनी है, तो Oncare Cancer Hospital में अनुभवी ऑन्कोलॉजी टीम से परामर्श लेकर एलएफटी, केएफटी और अन्य जरूरी जांचों के आधार पर सुरक्षित उपचार योजना बनवाई जा सकती है। सही समय पर जांच और सही डोज से इलाज अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाया जा सकता है।
डिस्क्लेमर
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दी गई जानकारी डॉक्टर की सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी प्रकार के कैंसर, जांच रिपोर्ट या उपचार से संबंधित निर्णय लेने से पहले योग्य कैंसर विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।
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Frequently Asked Questions
हाँ, दोनों सामान्य ब्लड टेस्ट हैं और खून के नमूने से किए जाते हैं।
अधिकांश मामलों में हाँ। डॉक्टर मरीज की स्थिति और दवा के अनुसार निर्णय लेते हैं।
डॉक्टर दवा की डोज बदल सकते हैं, अतिरिक्त जांच कर सकते हैं या कुछ समय बाद दोबारा टेस्ट करा सकते हैं।
हर बार नहीं। कई लैब बिना फास्टिंग के भी ये टेस्ट करती हैं, लेकिन अपने डॉक्टर या लैब के निर्देश का पालन करें।
Written and Verified by:
Dr. Gajendra Kumar Himanshu Exp: 10 Yr
Medical Officer
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