मायलोमा कैंसर क्यों खतरनाक माना जाता है

oncare team
Updated on Jan 15, 2026 14:01 IST

By Prashant Baghel

जब किसी व्यक्ति को यह पता चलता है कि उसे मायलोमा कैंसर है, तो उसके मन में डर और कई सवाल पैदा हो जाते हैं। अक्सर लोग इस बीमारी का नाम पहले नहीं सुनते, इसलिए यह और भी ज्यादा डराने वाली लगती है। सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि मायलोमा कैंसर आखिर क्यों खतरनाक माना जाता है, यह शरीर को कैसे नुकसान पहुंचाता है और क्या इसका इलाज संभव है। सही जानकारी न होने की वजह से मरीज और परिवार दोनों ही घबराहट में आ जाते हैं। 

आज के इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि मायलोमा कैंसर क्या होता है और इसे खतरनाक क्यों माना जाता है। इस लेख में हम मायलोमा कैंसर को खतरनाक मानने के कारणों के बारे में आपको बहुत ही आसान और विस्तार से जानकारी देंगे।

मायलोमा कैंसर क्या होता है

मायलोमा कैंसर एक तरह का ब्लड कैंसर होता है, जो प्लाज्मा सेल्स को प्रभावित करता है। प्लाज्मा सेल्स हमारी इम्यून सिस्टम का अहम हिस्सा होती हैं और शरीर को इंफेक्शन से बचाने में मदद करती हैं। जब यही सेल्स असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं, तो मायलोमा कैंसर बनता है।

यह कैंसर अक्सर हड्डियों के अंदर मौजूद बोन मैरो में फैलता है। यही वजह है कि मायलोमा सिर्फ खून तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हड्डियों, किडनी और इम्यून सिस्टम पर भी असर डालता है।

मायलोमा कैंसर को खतरनाक क्यों माना जाता है

मायलोमा कैंसर को खतरनाक इसलिए माना जाता है क्योंकि यह धीरे-धीरे शरीर के अंदर फैलता है और शुरुआत में इसके लक्षण बहुत साफ नहीं होते। अक्सर मरीज को तब पता चलता है जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है। यही देर इसे ज्यादा गंभीर बना देती है और इलाज को चुनौतीपूर्ण बना सकती है।

शुरुआत में लक्षणों का हल्का होना

मायलोमा कैंसर को खतरनाक मानने की सबसे बड़ी वजह यह है कि इसकी शुरुआत बहुत ही चुपचाप होती है। शुरुआती समय में मरीज को सिर्फ हल्की कमजोरी, थकान या शरीर में कभी-कभी दर्द महसूस होता है। यह लक्षण इतने सामान्य होते हैं कि लोग इन्हें उम्र बढ़ने, काम की थकावट, नींद की कमी या कैल्शियम की कमी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। इसी वजह से मरीज डॉक्टर के पास देर से पहुंचता है। जब तक सही जांच होती है, तब तक बीमारी शरीर के अंदर काफी आगे बढ़ चुकी होती है। यही देर इलाज को मुश्किल और बीमारी को ज्यादा गंभीर बना देती है।

हड्डियों को कमजोर करना

मायलोमा कैंसर का सीधा असर हड्डियों पर पड़ता है। यह बीमारी बोन मैरो में शुरू होती है, जो हड्डियों के अंदर मौजूद होता है। कैंसर कोशिकाएं हड्डियों को अंदर से खोखला करने लगती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि मरीज को पीठ, कमर, पसलियों या कंधों में लगातार दर्द रहने लगता है। यह दर्द धीरे-धीरे बढ़ता जाता है और दवाइयों से भी पूरी तरह ठीक नहीं होता। कई मामलों में बिना किसी बड़ी चोट के भी हड्डी टूट सकती है। हड्डियों का इस तरह कमजोर होना मरीज की चलने-फिरने की क्षमता को कम कर देता है और वह दूसरों पर निर्भर होने लगता है।

किडनी पर गंभीर प्रभाव

मायलोमा कैंसर को खतरनाक बनाने वाला एक और बड़ा कारण इसका किडनी पर असर है। इस बीमारी में शरीर में असामान्य प्रोटीन बनने लगते हैं। ये प्रोटीन खून के साथ किडनी तक पहुंचते हैं और वहां फिल्टर सिस्टम को नुकसान पहुंचाते हैं। धीरे-धीरे किडनी की सफाई करने की क्षमता कम होने लगती है। शुरुआत में मरीज को ज्यादा फर्क महसूस नहीं होता, लेकिन समय के साथ सूजन, थकान और पेशाब से जुड़ी समस्याएं सामने आने लगती हैं। कुछ गंभीर मामलों में किडनी फेल होने तक की स्थिति बन सकती है, जो मरीज के लिए जानलेवा भी हो सकती है।

इम्यून सिस्टम का कमजोर होना

मायलोमा कैंसर प्लाज्मा सेल्स को प्रभावित करता है, जो शरीर की रोगों से लड़ने में अहम भूमिका निभाती हैं। जब ये सेल्स कैंसर में बदल जाती हैं, तो शरीर की इम्यून सिस्टम कमजोर पड़ जाती है। इसका असर यह होता है कि मरीज को बार-बार इंफेक्शन होने लगते हैं। साधारण सर्दी, खांसी या बुखार भी जल्दी ठीक नहीं होता और कई बार गंभीर रूप ले सकता है। बार-बार अस्पताल जाना और एंटीबायोटिक लेना मरीज को शारीरिक और मानसिक रूप से थका देता है। कमजोर इम्यून सिस्टम मायलोमा कैंसर को और ज्यादा खतरनाक बना देता है।

खून की कमी और बढ़ती कमजोरी

मायलोमा कैंसर बोन मैरो में खून बनने की प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है। जब कैंसर कोशिकाएं बढ़ जाती हैं, तो स्वस्थ रक्त कोशिकाओं के लिए जगह कम हो जाती है। इससे शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की कमी हो जाती है, जिसे एनीमिया कहा जाता है। इसके कारण मरीज को बहुत जल्दी थकान हो जाती है। थोड़ा सा चलने या सीढ़ियां चढ़ने पर भी सांस फूलने लगती है। चक्कर आना, हाथ-पैर कांपना और ध्यान केंद्रित न कर पाना आम हो जाता है। यह कमजोरी मरीज की रोजमर्रा की जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित करती है।

शरीर में कैल्शियम का असंतुलन

हड्डियों के लगातार टूटने और कमजोर होने से खून में कैल्शियम की मात्रा बढ़ने लगती है। ज्यादा कैल्शियम होना शरीर के लिए खतरनाक माना जाता है। इससे मरीज को उल्टी, कब्ज, बहुत ज्यादा प्यास लगना और बार-बार पेशाब आने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कुछ मामलों में भ्रम, चिड़चिड़ापन और दिल की धड़कन से जुड़ी परेशानी भी देखने को मिलती है। अगर समय रहते इस स्थिति को संभाला न जाए, तो यह दिमाग और दिल पर गंभीर असर डाल सकती है।

इलाज का लंबा और जटिल होना

मायलोमा कैंसर का इलाज अक्सर लंबा चलता है। यह ऐसा कैंसर नहीं है जो एक बार इलाज से पूरी तरह खत्म हो जाए। इसमें दवाइयां, कीमोथेरेपी, टारगेटेड थेरेपी और कुछ मरीजों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती है। इलाज के दौरान मरीज को नियमित जांच, दवाइयों और डॉक्टर की निगरानी में रहना पड़ता है। कई बार बीमारी कंट्रोल में आ जाती है, लेकिन फिर दोबारा सक्रिय हो सकती है। यह अनिश्चितता मरीज और परिवार के लिए मानसिक रूप से भी बहुत चुनौतीपूर्ण होती है।

समय पर इलाज न मिलने का खतरा

अगर मायलोमा कैंसर की पहचान देर से हो, तो हड्डियों, किडनी और इम्यून सिस्टम को होने वाला नुकसान काफी ज्यादा हो सकता है। इस स्थिति में इलाज ज्यादा मुश्किल हो जाता है और मरीज की जीवन गुणवत्ता पर गहरा असर पड़ता है। समय पर जांच और सही इलाज न मिलने पर यह बीमारी जानलेवा भी बन सकती है।

इन सभी कारणों से मायलोमा कैंसर को खतरनाक माना जाता है। हालांकि सही समय पर पहचान, नियमित इलाज और अच्छी देखभाल से इस बीमारी को काफी हद तक कंट्रोल में रखा जा सकता है और मरीज बेहतर जीवन जी सकता है।

आज ही परामर्श लें

मायलोमा कैंसर एक गंभीर बीमारी जरूर है, लेकिन सही समय पर पहचान और सही इलाज से इसे कंट्रोल में रखा जा सकता है। अगर आपको या आपके किसी अपने को लंबे समय से हड्डियों में दर्द, बार-बार इंफेक्शन, कमजोरी या किडनी से जुड़ी परेशानी महसूस हो रही है, तो इसे नजरअंदाज न करें।

अगर आप भरोसेमंद और विशेषज्ञ इलाज की तलाश में हैं, तो Oncare Cancer Hospital एक विश्वसनीय विकल्प है। यहां अनुभवी डॉक्टरों की देखरेख में मायलोमा कैंसर का आधुनिक और मरीज-केंद्रित इलाज किया जाता है, ताकि मरीज को बेहतर इलाज के साथ मानसिक सुकून भी मिल सके।

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

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